दवाओं पर इस तरह मोटी कमाई करते हैं प्राइवेट अस्पताल

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यह जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि प्राइवेट अस्पताल दवाओं और डिवाइस में किस तरह मरीजों की जेब पर डाका डालते हैं। क्वॉलिटी के नाम पर वे मरीजों को बाहर से दवा खरीदने से मना करते हैं और उसी दवा एवं चिकित्सीय उपकरण को भारी कीमत पर मरीजों को बेचते हैं। इस तरह से वे 15 से 35 फीसदी प्रॉफिट कमाते हैं। प्राइवेट अस्पताल के इन दवाओं पर कमाए जाने वाले प्रॉफिट का अंदाजा इस उदाहरण से लगाया जा सकता है। शालिनी पहवा नाम की एक मरीज मल्टिपल माइलोमा नाम के कैंसर से पीड़ित थीं। उनको गुड़गांव के एक टॉप प्राइवेट अस्पताल में नोवार्टिस जोमेटा नाम का एक इंजेक्शन दिया गया, जिसकी प्रत्येक खुराक की कीमत 15,200 रुपये थी। उन्होंने दो सालों तक हर तीसरे से चौथे सप्ताह में इसकी एक खुराक ली। एक बार जब किसी काम से उनका बेंगलुरु जाना हुआ तो उनको दूसरे अस्पताल में वही इंजेक्शन सिर्फ 4,000 रुपये में मिल गया। इसके बाद उन्होंने जब गुड़गांव स्थित अस्पताल से इस बारे में बात की कि इसके दाम के बीच इतना फर्क क्यों है। तब जाकर उसी अस्पताल ने उनको सिप्ला ब्रैंड के जोल्ड्रिया के बारे में बताया, जिसकी एक खुराक की कीमत 2,800 रुपये थी।

इस पर पहवा ने पूछा, ‘उन लोगों ने मुझे सस्ते इंजेक्शन के बारे में पहले क्यों नहीं बताया? मुझे इंजेक्शन लेने के लिए मोलभाव क्यों करना पड़ा? अब मैं दूसरे अस्पताल में गई तो नाटको कंपनी द्वारा निर्मित जोलडोनैट नाम से यही इंजेक्शन सिर्फ 800 रुपये में मिल गया और अब मैं अच्छा महसूस कर रही हैं।’

नाम न छापने की शर्त पर एक रक्त विशेषज्ञ ने बताया, ‘कुछ डॉक्टरों का मानना होता है कि असल निर्माता कंपनी की दवा का इस्तेमाल क्वॉलिटी के लिहाज से ज्यादा बेहतर होता है। वहीं, कुछ लोग सोचते हैं कि सस्ती दवाएं बेहतर नहीं होंगी। लेकिन, जहां तक जेनेरिक्स दवाओं की बात है, ये किसी भी अच्छी कंपनी की उतनी ही बेहतर होती है, जितनी असल निर्माता कंपनियों की। इसलिए मरीजों को विभिन्न विकल्पों के बारे में बताना जरूरी है।’

नीचे दी गई की टेबल की मदद से आप कुछ दवाओं की एमआरपी और डिस्काउंट के बाद उनके मूल्य जान सकते हैं। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि प्राइवेट अस्पताल एमआरपी पर दवाओं और डिवाइस को बेचकर कितना फायदा कमाते हैं।

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लेकिन, सिर्फ क्वॉलिटी ही एकमात्र इशू नहीं है जिसकी वजह से अस्पताल ज्यादा से ज्यादा महंगे विकल्प मरीजों पर थोपते हैं। इसके पीछे प्रॉफिट का मार्जिन भी प्रमुख कारण है। इस इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्र के अनुसार, जोमेटा स्टॉकिस्ट को 13,000 रुपये में बेची जाती है यानी अस्पताल को इस पर 2,200 रुपये का बड़ा प्रॉफिट होता है। स्पष्ट है कि 2,800 रुपये वाले इंजेक्शन में इतना फायदा नहीं होगा।

आइये अब मेरोपीनम का उदाहरण लेते हैं जो बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाला ऐंटिबायॉटिक है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर गंभीर संक्रमण वाले मरीजों के लिए आईसीयू में किया जाता है। सिप्ला ब्रैंड के मेरोक्रिट को एक टॉप अस्पताल 2,965 रुपये प्रति ग्राम बेचता है। एक व्यस्क व्यक्ति को करीब 10 दिनों तक इसकी 1-2 ग्राम खुराक लेनी होती है। यानी एक मरीज को सिर्फ एक ऐंटिबायॉटिक पर 90,000 रुपये से 1.8 लाख रुपये खर्च करना पड़ता है। मेरोक्रिट अस्पतालों को 700-900 रुपये प्रति ग्राम के हिसाब से बेची जाती है। इस तरह से अस्पताल सिर्फ एक मरीज से 70,000 रुपये से 1.4 लाख रुपये तक कमाई कर लेता है।

नाम न छापने की शर्त पर एक सीनियर डॉक्टर ने बताया, ‘मेरोपीनम के अन्य ब्रैंड्स अन्य अस्पतालों में बहुत ही सस्ते दामों पर उपलब्ध है। जुवेंट्स द्वारा निर्मित मेरोपीनम के एक ग्राम की कीमत 698 रुपये है ल्युपिन द्वारा निर्मित एक खुराक की कीमत 988 रुपये। अस्पताल ल्युपिन ब्रैंड की मेरोट्रॉल को 600 रुपये ग्राम के हिसाब से खरीदते हैं। मरीज से अगर एमआरपी भी वसूली जाती है तो अस्पतालों को हर ग्राम में 400 रुपये का प्रॉफिट होता है और इस तरह से ज्यादा महंगे नहीं समझे जाने वाले अस्पताल भी दस दिन में एक ऐंटिबायॉटिक्स से एक मरीज से 12,000 से 24,000 रुपये कमा लेते हैं।’

सिर्फ बात दवाओं तक सीमित नहीं है, अस्पताल इलाज में इस्तेमाल होने वाली हर चीजों जैसे सिरिंज और कैथेटर्स से लेकर बैंडेज और डायपर्स तक भारी डिस्काउंट पर खरीदते हैं और मरीजों को एमआरपी पर बेचते हैं। मरीजों को क्वॉलिटी का हवाला देकर बाहर से दवाएं और उपकरण खरीदने से मना किया जाता है। इस तरह से अस्पतालों का फायदा ही फायदा होती है।

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