आरबीआई का नोट सिर्फ रसीद, छापें अपनी करेंसी ! आजादी के बाद भी हमारी अपनी करेंसी नहीं है

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रोहतक | देश की आजादी के 67 वर्ष हो चुके हैं। अब तक हमारी अपनी करेंसी नहीं है। रिजर्व बैंक जो नोट जारी करता है, वह केवल एक रसीद है। हमें पूर्ण रूप से आजादी चाहिए तो देश को अपनी करेंसी छापनी होगी। पहले हमारा रुपए और डॉलर बराबर थे। पिछले 67 साल में ऐसा क्या हुआ कि डॉलर बढ़ता गया और रुपया गिरता गया। यह सब बैंकों का खेल है। यह कहना है युवा क्रांति संस्था के संजय सामाजिक का। वे शनिवार को कोर्ट परिसर स्थित बार रूम में आज हम कितने आजाद विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।

कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि 1911 से 1950 के बीच स्वदेशी और स्वावलंबी भारत की बात होती थी। दरअसल, 15 अगस्त 1947 को केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ है। आजादी के बाद भी देश का अपना तंत्र कोई नहीं है। हर क्षेत्र का निजीकरण हो रहा है। इसीलिए हम 67 साल बाद स्वावलंबन की बात कर रहे हैं। हमें जो आजादी चाहिए थी, वह सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह की शर्तों पर मिलनी थी। सरकार ने अपना 1935 में अपना एक्ट बनाया, उसमें कहीं कोमा, फुल स्टॉप का भी बदलाव नहीं किया गया। इंडियन पैनल कोड, पुलिस एक्ट, सीआरपीसी सब कानून अंग्रेजों ने बनाए थे। वे अब तक वैसे ही चल रहे हैं। शिक्षा भी अंग्रेजी पैटर्न पर चल रही है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसकी करेंसी होती है। जबकि हमारे पास अपनी करेंसी ही नहीं है। यह 125 करोड़ भारतीयों के मौलिक अधिकारों का हनन है। भारत सरकार अपनी मुद्रा छापे तो ही देश की बेरोजगारी, मंदी अपने आप दूर हो जाएगी।

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