गाय ने बचा ली जान, वरना एक धमाके में एक साथ शहीद हो जाते BSF के जवान      

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कांकेर. चर्रे-मर्रें बीएसएफ कैंप से लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर नक्सलियों ने जवानों को क्षति पहुंचाने की नीयत से जमीन में प्रेशर बम लगा रखा था। यह संयोग ही था कि जवानों से पहले उधर से गुजर रही गाय उसकी चपेट में आकर घायल हो गई। बम की आवाज सुनते ही जवान सतर्क हो गए और घटना स्थल और आस-पास के इलाके में सर्च अभियान किया।

बताया जा रहा है कि यह बम लगभग चार किलो का था। नक्सलियों ने इसे कैंप से कुछ ही दूरी पर मिट्टी के नीचे छिपा रखा था, जिससे सर्चिंग अभियान पर निकलते वक्त बीएसएफ जवानों को क्षति पहुंचाया जा सके लेकिन जवानों से पहले ही उधर से गुजर रही गाय का पैर बम के ऊपर पड़ गया, जिससे वह फट गया और गाय बुरी तरह घायल हो गई।

कैंप के पास ही बम फटने की आवाज सुनकर कैंप में हड़कम्प मच गया। जवान तुरंत अपने पोजिशन में आ गए और अपनी पूरी तैयारी के बाद घटना स्थल की ओर रवाना हुए, जहां गाय घायल होने के बाद तडफ़ड़ा रही थी। जानकारी के अनुसार जवानों ने गाय का प्राथमिक उपचार अपने कैंप से डाक्टर को बुलाकर कराया। लोगों का कहना है कि कैंप के नजदीक ही इस घटना को अंजाम देना नक्सलियों द्वारा काफी घातक प्लानिंग हो सकता था लेकिन गाय के कारण उनके नापाक इरादों पर पानी फिर गया।

घटना ने चिलपरस रास्ते की दिलाई याद 
नक्सलियों द्वारा मिट्टी में छिपाकर लगाए गए बम ने लगभग दस साल पूर्व कोयलीबेड़ा क्षेत्र में चिलपरस के रास्ते में नक्सलियों द्वारा गड्ढे खोदकर मिट्टी पाटने की घटना को ताजा कर दिया। यह बता दें कि उस समय कोयलीबेड़ा क्षेत्र में पहली बार केंद्रीय फोर्स आने वाली थी और उनकी गाड़ी चिलपरस के जंगल में होकर आगे की ओर बढऩे का प्लान था। इसको देखकर नक्सलियों ने चिलपरस के जंगल के रास्ते में ही बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर उसके ऊपर लकड़ी रखकर पाट दिया। यह संयोग था कि गाड़ी से पहले ही एक उसी रास्ते से एक सांड़ गुजरा और उसका पैर उसी पाटे गए गड्ढे पर पड़ा, जिससे वह साढ़ गड्ढे में गिर गया। इससे नक्सलियों के इरादे चकनाचूर हो गए थे। वह गड्ढा आज भी चिलपरस के जंगल में है।