14 से 60 वर्ष की आयु वाले कभी ना करे ये काम, अपनाएं ये दिनचर्या, हमेसा रहेंगे रोगमुक्त

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पित्त प्रकृति के लोगों की दिनचर्या – पित्त प्रकृति के लोगों की उम्र 15 से 60 साल होती है पित्त प्रकृति के लोगों पर कफ का असर कम हो जाता है तो उनको ज्यादा सोना जरुरी नही है. अगर पित्त प्रकृति के लोग 7 या 8 घंटे भी सो रहे हैं तो बहुत है. 6 घंटे की नींद भी ले सकते हैं. लेकिन 6 घंटे से कम नही और 8 घंटे से ज्यादा न सोयें.

वागभट्ट जी के अनुसार सूर्यास्त के दो घंटे बाद सो जाएँ यानि अगर 6 बजे सूर्य अस्त हुआ तो 8 बजे तक सो जायें और सुबह 4 बजे तक उठ जायें. पित्त प्रकृति के लोग ब्रह्ममुहूर्त में उठ ही जाएँ तो अच्छा है और बच्चे सोते ही रहें तो उनके लिए अच्छा है. अगर आप चार बजे उठेंगे तो आपका पूरा दिन बेहतरीन और व्यवस्थित है और अगर आप ब्रह्ममुहूर्त के बाद उठेंगे तो आपका पुआ दिन व्यर्थ है इसका कारण ये है कि आपको जो जो करना है वो 4 बजे से ही शुरू होगा

4 बजे उठे उषापान किया, शौच के लिए जाएँ, 10-15 मिनट उसमें लगेंगी, फिर दान्तुन करें.

दांत साफ़ कैसे करें – पित्त प्रकृति के लोगों के लिए दांत ऐसे साफ करना जो स्वाद में कसाए हो, कसाए मतलब कड़वा और तिक्त है. ऐसी चीजों से आपको दांत साफ़ करना है क्यूंकि आपकी प्रकृति पित्त की है तो पित्त को कम करना, या पित्त को कंट्रोल करके रखना ये कसाए और तिक्त चीजों से ही होगा, तो इसका मतलब आप नीम का दातुन करें. वागभट्ट जी ने कोलगेट के लिए मना किया है

और नीम से भी अच्छी उन्होंने एक धातु बताया है मदार. क्योंकि वो और ज्यादा कसाए है और ज्यादा तिक्त. फिर एक है बबूल और फिर आता है अर्जुन की दातुन. तो ऐसे 12 वृक्ष उन्होंने बताये हैं. नीम है, अर्जुन है, आम, बबूल, अमरुद है ऐसे 12 वृक्षों का उन्होंने वर्णन किया है कि इनका दातुन ही करना किसी 13वें वृक्ष की दातुन वर्जित है.

उन्होंने आगे लिखा है कि जीवन में जो ऋतू है गर्मी है, सर्दी है, बरसात है 3 तो मुख्य ऋतुएं है. हर सीजन के लिए वागभट्ट जी ने अलग दातुन बताई है.

वे कहतें हैं कि जब गर्मी का सीजन है माने अप्रैल से शुरू करें और जब तक बारिश का सीजन नही आता, तब तक नीम की दातुन करें. हमारे बजुर्ग कहते थे कि चेत्र का महिना आ गया है नीम के पत्ते चबा लो, पूरा साल काम नही चलेगा. जो वागभट्ट जी का कैलकुलेशन है. क्यूंकि ये जो समय है इसमें पित्त को भड़कने से बचाने में सबसे बड़ी मदद नीम करेगा. तो नीम का दातुन करें, नही तो बबूल, या फिर मदर का दातुन करें. लेकिन गर्मियों में सबसे अच्छा नीम है.

और सर्दियों के दिनों में सबसे अच्छी दातुन अमरुद है. अमरुद के पेड़ का दातुन सर्दियों के लिए सबसे अच्छा है. और अमरुद के अलावा जामुन के पेड़ का दातुन बताया हा वागभट्ट जी ने.

फिर उन्होंने सर्दियों के बारे में बताया है कि आम का भी कर सकते हैं, अर्जुन का भी कर सकते हैं. और अगर आप बोलें कि सारे साल अगर नीम का ही करें तो वागभट्ट जी कहते हैं कि कर तो सकते हैं लेकिन 3 महीनें लगातार करके फिर थोड़े दिन के लिए छोड़ दें फिर 3 महीने करें.

फिर आप कहेंगे कि थोड़े दिन छोड़ दिया तो फिर छोड़े हुए दिनों में क्या करेंगे, तो उन्होंने कहा कि दन्त मंजन करें. और कैसा मंजन करीं तो उन्होंने कहा है कि जिस क्षेत्र में रह रहे हैं उस क्षेत्र का तेल और उस क्षेत्र का नमक और उसी क्षेत्र की हल्दी, ये तीनो मिलाकर फिर पाउडर बना कर मंजन कर सकते हैं.

दूसरा दन्त मंजन उन्होंने बताया है कि गाय के गोबर को सुखा कर जलाएं. उसकी राख में थोडा कपूर मिलाएं थोडा सेंधा नमक मिलाएं, बहुत अच्छा दन्त मंजन है.

दूसरा उन्होंने बताया कि त्रिफला चूर्ण है उसको दन्त मंजन के लिए बारीक़ कूट लें और खाने के लिए मोटा रहने दें. बारीक त्रिफला चूर्ण, थोडा सेंधा नमक बस मिलाके दांत पे घिसें, बहुत अच्छा दन्त मंजन है. ऐसे 8 तरह के दन्त मंजन है और 12 दान्तुन हैं इन्हें जरुर करें. मतलब कोलगेट न करें.

वागभात जी और आधुनिक विज्ञानं की अगर तुलना करें तो आप पित्त के प्रभाव में है सुबह सो कर उठेंगे तो मुँह में पित्त ही भरा होगा. और ये असर ज्यादा होता है लार का, तो अब इसको कंट्रोल करना है तो  ये दातुन अच्छी हैं. लेकिन अगर आप ब्रश करेंगे तो उसमें चीनी है. चीनी है तो शुगर है, और शुगर और पित्त का झगडा है. तो सुबह उठते ही अगर आप पेस्ट कर रहें हैं तो सर्वनाश है.

मीठा पेस्ट अगर पित्त में मिलाएं तो पित्त को तो ख़राब करेगा ही, साथ में मुँह को भी ख़राब करेगा. क्यूंकि सुबह का मुँह आपका अगर मीठे के असर में आया, तो 101% चान्स है कि आपके दांत ख़राब होने जल्दी स्टार्ट होंगे. और ऑब्जरव करें तो पाएंगे कि सबसे ज्यादा दांत में कीड़ा पेस्ट करने वालों के ही हैं. मतलब दांत उनके ही ख़राब हैं. तो विज्ञान के हिसाब से तो ख़राब है ही.

धर्म के हिसाब से और भी गलत है. सभी टूथपेस्ट और ब्रश मारे हुए जानवरों की हड्डियों से बनते हैं. जैसे कोलगेट बन रहा है मारे हुए सूअर की हड्डियों से और ये प्रयोगशाला में परमाणीत है और पेपसोडेंट बन रहा है मरी हुयी गाय की हडियों से. और क्लोज-अप बन रहा है मारे हुए बकरों की हड्डियों से. और अगर आप शाकाहारी है, जैन है तो आप सुबह सुबह हड्डियों को मुँह में ले रहे हैं कोन से धर्म का पालन कर रहें है. और जैन धर्म वाले ये जानते हैं कि तो प्रत्यक्ष हिंसा का जितना पाप है परोक्ष हिंसा का भी उतना ही पाप है. तो उन जानवरों को मारने वालों के पास जितना पाप है आप के पास भी उतना ही है तो कसाई का पाप अपने सिर क्यों लेना. तो कर दीजिये ये कोलगेट क्लोज- अप करना

आगर आपके यहाँ दातुन नही मिलता तो दन्त मंजन करें लेकिन कोलगेट या क्लोज- अप या पेप्सोडेंट बंद कर दें. और त्रिफला चूर्ण का मंजन आप किसी भी मौसम में कर सकते हैं. तो आप इसका ध्यान रखिये.

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