कैसे “गुप्त” महा-जूरी नागरिकों को हानि पहुंचा रही है और समाधान

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तथाकथित रिकौलिस्ट बड़ी बेशर्मी से ये समर्थन करते हैं कि सभी जूरी सिस्टम की कार्यवाई और दूसरे प्रस्ताव जैसे रिकॉल आदि गुप्त रहे. लेकिन दूसरे देशों में, जैसे अमेरिका में, कार्यवाई को गुप्त रखने से क्या नुकसान होता है और हमारे देश के नागरिकों को ऐसे गुप्त सिस्टम को लागू करने से क्या नुकसान होगा और ऐसा नुकसान न हो, उसके लिए क्या समाधान है, इस लेख में हम ये बताएँगे.

दूसरे देशों में, जैसे अमेरिका में, कार्यवाई को गुप्त रखने से क्या नुकसान होता है और हमारे देश के नागरिकों को ऐसे गुप्त सिस्टम को लागू करने से क्या नुकसान होगा और ऐसा नुकसान न हो, उसके लिए क्या समाधान है, इस लेख में हम ये बताएँगे.

रिकॉल का मतलब नागरिक उनके जनसेवकों को किसी भी दिन बदल सकते हैं. जूरी मुकदमा का मतलब है कि क्रमरहित तरीके (लॉटरी) से चुने गए नागरिक मुकदमे का फैसला देते हैं, न कि जज. महा-जूरी (ग्रैंड जूरी) का मतलब होता है कि नागरिक क्रम-रहित तरीके से (लॉटरी से) मतदाता सूची से चुने जाते हैं और ये महा-जूरी सदस्य निर्णय करते हैं कि किसी शिकायत पर जूरी मुकदमा चलाया जायेगा कि नहीं.

महा-जूरी 12वी शताब्दी में, इंग्लैंड में शुरू हुई थी और उसका उद्देश्य सरकार द्वारा संभावित दुरुपयोग रोकना था. इंग्लैंड से महाजूरी का सिस्टम इंग्लैंड के उपनिवेश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में फैला. शुरुवात में, महा-जूरी की कार्यवाई जनता के लिए खुली थी लेकिन बाद में महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त हो गयीं विशेषकर अमेरिकी स्वतंत्र के बाद, महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त हो गयीं.

महा -जूरी 12वी शताब्दी में, इंग्लैंड में शुरू हुई थी और उसका उद्देश्य सरकार द्वारा संभावित दुरुपयोग रोकना था.
इंग्लैंड से महाजूरी का सिस्टम इंग्लैंड के उपनिवेश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में फैला.
शुरुवात में, महा-जूरी की कार्यवाई जनता के लिए खुली थी लेकिन बाद में महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त हो गयीं.

कृपया ये वीडियो देखिये जहाँ अमेरिका में पोलिस अफसर की लापरवाही के कारण एक व्यक्ति मरा और महा-जूरी ने उस पोलिस अफसर के खिलाफ मामला स्वीकार करने से इनकार कर दिया जबकि सार्वजानिक दिख रहा है कि क्या हुआ !!! संयुक्त राज्य अमेरिका में ऐसे मामले अकसर होते हैं और इसका कारण ये है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहती हैं.
https://www.theguardian.com/us-news/video/2014/dec/04/i-cant-breathe-eric-garner-chokehold-death-video
(ये एक वीडियो है जो एक राह चलते व्यक्ति ने खींची थी जिसमें एरिक गार्नर नामक व्यक्ति को पोलिस अफसर ने गले से दबोचा. एरिक गार्नर, आयु 43 वर्ष को हाँफते हुए सुना जा सकता है ‘I can`t breathe (मैं सांस नहीं ले सकता)’ . बाद में, एरिक गार्नर को हस्पताल ले जाने पर उसको मृत घोषित किया गया. सबूत सार्वजानिक होने पर भी महा-जूरी ने जब मामला दाखिल करने से मना कर दिया, ऐसे मामलों के कारण, न्यू योर्क और अन्य जगह में विरोध, दंगे और प्रतिघात हुए)

कृपया ये वीडियो देखिये कैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में “गुप्त” महा-जूरी वहां के नागरिकों को हानि पहुंचा रहे हैं.
गुप्त महा-जूरी सदस्यों ने एक ऐसे मामले को स्वीकार करने से मना कर दिया जिसमें स्पष्ट दिख रहा था कि पोलिस अफसर ने एरिक गार्नर नामक व्यक्ति को गला दबाकर मार दिया.

अभी, हम जूरी सिस्टम का समर्थन करते हैं, जज सिस्टम का नहीं लेकिन हमारे विचार में, “जूरी” के लेबल के नीचे बुरे प्रावधानों का बढ़ावा करना उतना ही नुकसानदायक है जितना कि एक बुरे जज सिस्टम का बढ़ावा करना या उससे भी अधिक नुकसानदायक हो सकता है.

महा-जूरी की जो भी प्रक्रिया है, यदि महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहेगी, जनता को आसानी से उपलब्ध नहीं रहेंगी, महा-जूरी मामले को लेने से इनकार कर सकती हैं और जनता को महा-जूरी का ऐसा करने का कारण नहीं पता चलेगा. महा-जूरी का फैसल सही भी हो, तो भी उन जातियों / समूहों जिनके सदस्य के विरुद्ध महा-जूरी ने फैसल दिया था, उनको ये मनवाना बहुत कठिन हो जायगा कि महा-जूरी का फैसल सही था. इससे उन जातियों / समूहों में अविश्वास पैदा होने की सम्भावना काफी बढ़ जाती है और इसके परिणाम स्वरूप वे जातियां / समूह महा-जूरी के गुप्त फैसलों का विरोध करेगी और इससे दंगे होंगे.

तथाकथित रिकौलिस्ट ये दावा कर सकते हैं कि ये केवल एक भेद-भाव की समस्या है जो संयुक्त राज्य अमेरिका तक सीमित है. लेकिन हम देख सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के बैक के क्षेत्र में कालों के विरुद्ध पहले काफी भेद-भाव था. लेकिन, संयुक्त राज्य अमेरिका के कार्यकर्ताओं ने सरकार को मजबूर किया कि ऐसे नियम पारित करे जिसके द्वारा बैंक लोन देने के तरीकों को सार्वजानिक करे और इस प्रकार, कार्यकर्ताओं ने इस भेद-भाव को कम किया. जबकि पोलिस और महा-जूरी की कार्यवाई के मामले में भेद-भाव को कार्यकर्ता कम नहीं कर पाए क्योंकि महा-जूरी की कार्यवाई जनता को उपलब्ध नहीं है. अधिक के लिए देखिये – https://web.archive.org/web/20130809022759/http://lamar.colostate.edu/~pr/redlining.pdf 

जब महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहेगी, पहले से मौजदू कोई भेद-भाव जैसे जातिवाद के बढ़ने की सम्भावना अधिक हो जाती है. जब महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहेगी, जनता ये नहीं जान सकती कि महा-जूरी ने मामले को जूरी मुकदमे के लिए क्यों नहीं जाने दिया – क्या कोई वास्तविक कारण था जैसे सबूतों का आभाव या महा-जूरी सदस्यों ने कोई भेद-भाव किया था. महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त होने से, दंगे करने वालों को शांत करने के लिए सही जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं हो पायेगा. दंगों का एक मुख्य कारण अफवाह है – जिसको नागरिक जानकारी के आसानी से उपलब्ध न होने के कारण जांच नहीं सकते.

जब महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहेगी, पहले से मौजदू कोई भेद-भाव जैसे जातिवाद के बढ़ने की सम्भावना अधिक हो जाती है.
जब महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त रहेगी, जनता ये नहीं जान सकती कि महा-जूरी ने मामले को जूरी मुकदमे के लिए क्यों नहीं जाने दिया –क्या कोई वास्तविक कारण था जैसे सबूतों का आभाव या महा-जूरी सदस्यों ने कोई भेद-भाव किया था. महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त होने से, दंगे करने वालों को शांत करने के लिए सही जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं हो पायेगा.

मान लीजिए कि ऐसा गुप्त महा-जूरी वाला जूरी सिस्टम हमारे देश में आ जाता है और मान लीजिए आपके पिता, भाई आदि रिश्तेदार को अन्यायपूर्वक दूसरी जाती या धर्म की पोलिस हत्या कर देती है. तो फिर, जातियों, धर्म में गलतफहमी के कारण, दंगे भी हो सकते हैं. तो क्या हमें ऐसा त्रुटिपूर्ण, गुप्त जूरी सिस्टम का अपने स्वार्थ या अंध-भक्ति के कारण बढ़ावा करना चाहिए ?

मान लीजिए कि ऐसा गुप्त महा-जूरी वाला जूरी सिस्टम हमारे देश में आ जाता है और मान लीजिए आपके पिता, भाई आदि रिश्तेदार को अन्यायपूर्वक दूसरी जाती या धर्म की पोलिस हत्या कर देती है.
तो फिर, जातियों, धर्म में गलतफहमी के कारण, दंगे भी हो सकते हैं. तो क्या हमें ऐसा त्रुटिपूर्ण, गुप्त जूरी सिस्टम का अपने स्वार्थ या अंध-भक्ति के कारण बढ़ावा करना चाहिए ?

तथाकथित रिकौलिस्ट ने महा-जूरी की कार्यवाई को गुप्त रखने का प्रस्ताव किया है, कि गैर-गोपनीय सरकारी दस्तावेज सरकारी वेबसाईट पर आसानी से उपलब्ध नहीं होना चाहिए, लेकिन हम ऐसे प्रस्ताव का विरोध करते हैं.

तथाकथित रिकौलिस्ट द्वारा महा-जूरी के झूठ और दुष्ट दावे और उन दावों के खंडन

तथाकथित रिकौलिस्ट का दुष्ट दावा नंबर 1 –

तथाकथित रिकौलिस्ट ये दावा करते हैं कि कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत नहीं हो, तो भी महा-जूरी मामले को दाखिल कर लेगी और फिर जूरी झूठ पकड़ने वाले जांच द्वारा कार्यवाई करेगी और तथाकथित रिकौलिस्ट चाहते हैं कि ये सभी कार्यवाई गुप्त रहे. तथाकथित रिकौलिस्ट ये दावा करते हैं कि ऐसा करने से, महा-जूरी जादू से दोषी को ढूँढ सकेंगे और उन्हें सज़ा देंगे.

खंडन –

कृपया पहले दिया गया वीडियो लिंक देखिये जहाँ पर बताया गया है कि गुप्त महा-जूरी ने मामले को दाखिल जर्बे से इनकार कर दिया, बावजूद इसके कि सार्वजानिक रूप से दिख रहा है कि पोलिस अफसर ने एरिक गार्नर को गला दबाकर मार दिया. केवल ये कहना “महा-जूरी ये करेगी, वो करेगी” से ये अर्थ नहीं है कि वो हो जायेगा. यदि कार्यवाई गुप्त रहेंगी, तो हमें ये नहीं पता चलेगा कि झूठ पकड़ने वाली जांच, नार्को सही से किए गए थे कि नहीं. और हम ये नहीं पता लगा सकते कि महा-जूरी ने मामले दाखिल करने से क्यों इनकार किया.

हमें विभिन्न जगह के सिस्टम देखना चाहिए. संयुक्त राज्य अमेरिका में 50 राज्य हैं और हर राज्य में अलग-अलग सिस्टम हैं और वहां केन्द्र में अलग ही जूरी मुकदमे का सिस्टम है. तो हम सभी कार्यकर्ताओं से विनती करेंगे कि पहले विभिन्न सिस्टम का अध्ययन करें और फिर निर्णय करें कि कौनसे कानून का बढ़ावा करना है और कौनसे कानून की मांग करने है ताकि देश की समस्याएं कम हो सकें. नहीं तो उसी प्रकार से होगा कि एक डॉक्टर बिना दवाई के बारे में पढ़े, दवाई लिख रहा है.

हम सभी कार्यकर्ताओं से विनती करेंगे कि पहले विभिन्न सिस्टम का अध्ययन करें और फिर निर्णय करें कि कौनसे कानून का बढ़ावा करना है और कौनसे कानून की मांग करने है ताकि देश की समस्याएं कम हो सकें.
नहीं तो उसी प्रकार से होगा कि एक डॉक्टर बिना दवाई के बारे में पढ़े, दवाई लिख रहा है.

और दुनिया में कहीं भी बिना प्रथम दृष्टया सबूत के जज या जूरी मामले को दाखिल नहीं करते.

और 2G के मामले में, बहुत गडबडियां दिख रही थीं जैसे उस समय के दूरसंचार मंत्री ए.राजा ने बिना कोई कारण दिए 2G की अर्जी जमा करने की घोषित अंतिम तिथि को पीछे कर दिया. उस समय और भी अनियमिताएं दिख रही थी जिसके कारण अरुण अग्रवाल और स्वयंसेवी संस्था `टेलीकौम वाचडौग` ने सी.वी.सी. (केंदीय सतर्कता आयोग) को शिकायत की और फिर सी.वी.सी. ने सी.बी.आई. को जांच करने के लिए कहा. देखिये – https://indianexpress.com/article/india/politics/raja-from-minister-to-accused/  

तथाकथित रिकौलिस्ट द्वारा दुष्ट दावा नंबर 2 –

तथाकथित रिकौलिस्ट ये दावा करते हैं कि एक बार जूरी, रिकॉल आदि आ जाते हैं, तो कोई जादुई ढंग से सरकार जनता को सारे गैर-गोपनीय दस्तावेज सरकारी वेबसाईट पर दिखाने शुरू कर देंगे. तथाकथित रिकौलिस्ट “बाद में” का बहाना देते हैं अपने प्रस्तावित कानून-ड्राफ्ट में ये 2 धाराएं जोड़ने के लिए कि सभी गैर-गोपनीय दस्तावेज सरकारी वेबसाईट पर आसानी से उपलब्ध होंगे.

खंडन-

संयुक्त राज्य अमेरिका में, जूरी मुकदमे की कार्यवाई जनता के लिए खुली है लेकिन महा-जूरी की कार्यवाई गुप्त है. इस कारण से, समय बीतने पर, महा-जूरी के अधिकार और प्रयोग कम हुए हैं. आज के समय में, संयुक्त राज्य अमेरिका में केन्द्रीय स्तर पर, केवल गंभीर अपराधों में ही महा-जूरी का प्रयोग किया जाता है. संयुक्त राज्य अमेरिका के आधे से अधिक राज्य बहुत ही कम मामलों में महा-जूरी का प्रयोग करते हैं. “गुप्त” महा-जूरी के बदले, वहां एक दूसरी प्रक्रिया का प्रयोग होता है जिसमें जज ये तय करता है कि जूरी मुकदमे के लिए मामला दाखिल करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सबूत है कि नहीं और जज ही अंत में सारे आरोप तय करता है.

संयुक्त राज्य अमेरिका के आधे से अधिक राज्य बहुत ही कम मामलों में महा-जूरी का प्रयोग करते हैं. “गुप्त” महा-जूरी के बदले, वहां एक दूसरी प्रक्रिया का प्रयोग होता है जिसमें जज ये तय करता है कि जूरी मुकदमे के लिए मामला दाखिल करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सबूत है कि नहीं और जज ही अंत में सारे आरोप तय करता है.

ऐसा क्यों ? क्योंकि जो “गुप्त” महा-जूरी के बिना वाला विकल्प है, उसमें अधिक पारदर्शिता है और उस प्रक्रिया की कार्यवाई जनता को आसानी से उपलब्ध रहती है. तो आप देख सकते हैं कि तथाकथित रिकौलिस्ट का ये दावा कि अभी पारदर्शिता की कोई आवश्यकता नहीं है और तथाकथित रिकौलिस्ट का ये दावा कि जूरी, रिकॉल आदि आने के बाद सबकुछ पारदर्शी हो जायेगा केवल एक दिवा सपना ही है.

रिकॉल, जूरी सिस्टम होने के बावजूद, बड़े शहरों में आर्थिक मंदी आई और बड़े स्तर पर लोगों ने उपनगरों की ओर पलायन किया. इस कारण से संयुक्त राज्य अमेरिका के मिस्सूरी नामक राज्य के फेर्गूसन शहर में अधिकतर मतदाता काले हैं लेकिन अधिकतर अफसर गोरे हैं !! ऐसे शहरों की मुख्य आमदनी अन्यायपूर्वक कालों पर पोलिस के जुर्माने और अन्यायपूर्वक कोर्ट के जुर्माने लगाना है. और जब काले ये जुर्माने नहीं भर पाते, तो उन्हें जेल में डाल दिया जाता है !!! कृपया अधिक जानकारी यहाँ देखिये –
1. https://www.nytimes.com/2014/08/18/opinion/in-ferguson-black-town-white-power.html
2. https://www.dailykos.com/stories/2014/08/18/1322691/-The-Seamy-Underbelly-Of-Ferguson-Starts-To-Appear

कोई भी सुधार आने के लिए, कार्यकर्ताओं को सरकार पर पर्याप्त दबाव डालना होता है और ये दबाव सुधार न चाहने वाली लॉबियों के दबाव से अधिक होना चाहिए. हमें आज और अभी मांग करनी चाहिए कि सभी जूरी की कार्यवाई और सभी गैर-गोपनीय सरकारी दस्तावेज आसानी से, सरकारी वेबसाइट पर जनता को उपलब्ध होने चाहिए. तभी, जनता देख पायेगी कि कोई गलत कार्य हो रहा है और गलतियों को हटाने के लिए सुधार लाये जा सकते हैं.

कोई भी सुधार आने के लिए, कार्यकर्ताओं को सरकार पर पर्याप्त दबाव डालना होता है और ये दबाव सुधार न चाहने वाली लॉबियों के दबाव से अधिक होना चाहिए.
हमें आज और अभी मांग करनी चाहिए कि सभी जूरी की कार्यवाई और सभी गैर-गोपनीय सरकारी दस्तावेज आसानी से, सरकारी वेबसाइट पर जनता को उपलब्ध होने चाहिए.
तभी, जनता देख पायेगी कि कोई गलत कार्य हो रहा है और गलतियों को हटाने के लिए सुधार लाये जा सकते हैं.

हम ऐसा कानून-ड्राफ्ट प्रस्ताव करते हैं जहाँ महा-जूरी और जूरी के लिखित प्रतिलिपि  और सूचना अधिकार द्वारा मान्य मामले के दूसरे दस्तावेज को महा-जूरी मंडल / जूरी मंडल की स्वीकृति द्वारा सरकारी वेबसाईट पर प्रकाशित किया जायेगा. बाद के संस्करण में, हम कानून-ड्राफ्ट में जोडेंगे कि कोर्ट मामले के दोनों पक्षों को प्रथम दृष्टया सबूत और गवाह पेश करने की अनुमति होनी चाहिए ताकि महा-जूरी सदस्य निर्णय कर सकें कि मामला दाखिल होना चाहिए कि नहीं.

समाधान क्या है – कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए ?

कार्यकर्ताओं को अंधे हो कर कॉपी-पेस्ट करना और लिंक शेयर करना छोड़ देना चाहिए और विभिन्न देशों के कानूनों का अध्ययन करना चाहिए. और चर्चा करनी चाहिए कि विभिन्न देशों के कानूनों की धाराओं का क्या प्रभाव हो रहा है.

हमने पहले के लेखों में बताया है कि कैसे स्लोवाकिया के कार्यकर्ता, बिना जूरी और बिना रिकॉल प्रक्रिया के, अपने स्थानीय स्तर पर सुधार लाये. एक बार स्थानीय स्तर पर सुधार लागू हो गए, तो वे पूरे देश में फैल गए और लागू हो गए. स्लोवाकिया देश में अब कानून है कि सरकारी दस्तावेज तभी वैध होंगे जब वे सरकारी वेबसाईट पर आयेंगे और इससे स्लोवाकिया में गुप्त भ्रष्टाचार कम करने में सहायता मिल रही है. ऐसा किसी भी देश में किया जा सकता है – चाहे वो देश बड़ा हो या छोटा, विकसित हो या विकासशील. कृपया अधिक जानकारी के लिए ये लिंक देखिये – https://www.facebook.com/CitizenVerifiableLaws/posts/351894655613720

हमने पहले के लेखों में बताया है कि कैसे  कार्यकर्ता, बिना जूरी और बिना रिकॉल प्रक्रिया के, अपने स्थानीय स्तर पर सुधार लाये. एक बार स्थानीय स्तर पर सुधार लागू हो गए, तो वे पूरे देश में फैल गए और लागू हो गए.

भारतीय कार्यकर्ताओं को भी इसी प्रकार से प्रयास करना चाहिए. आपके छोटे-छोटे प्रयास भी, जिसमें कम समय लगेगा, आपस में जुड़कर बड़े हो सकते हैं और परिणाम ला सकते हैं. कार्यकर्ताओं को अपने नगर आयुक्त, जिला कलेक्टर, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद आदि जनसेवकों से मांग करनी चाहिए कि सभी गैर-गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को सरकारी वेबसाईट पर जनता को उपलब्ध करवाए जायें. आप इसका प्रस्ताव इस पेज के कवर फोटो के विवरण में देख सकते हैं – https://facebook.com/CitizenVerifiableLaws

कार्यकर्ताओं को राष्ट्र-विरोधी साइट जैसे newindia, change dot org आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए और कार्यकर्ताओं को त्रुटिपूर्ण कानून-ड्राफ्ट, जिनमें कोई पारदर्शिता नहीं है, ऐसे त्रुटिपूर्ण कानून-ड्राफ्ट का सहारा लेकर, चुनावी बयान-बाजी नहीं करनी चाहिए. जबतक किसी क्षेत्र में कम से कम 1% मतदाता ये मांग नहीं कर रहे हैं कि गैर-गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को सरकारी वेबसाइट पर दिखाया जाये, तबतक उस क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए.

आप देखेंगे कि जैसे चुनाव पास आते हैं, ऐसे पोस्ट होंगे जिसमें किसी प्रस्तावित कानून-ड्राफ्ट के लिए दान देने की बात होगी जबकि उन ड्राफ्ट की धाराओं पर कभी चर्चा ही नहीं हुई कि कैसे उन ड्राफ्ट के धाराएं गुप्त भ्रष्टाचार कम करेंगे. हम ऐसे व्यक्तियों को दान या समर्थन नहीं करेंगे, सभी अपना-अपना निर्णय कर सकते हैं कि क्या करना है – त्रुटिपूर्ण कानून-ड्राफ्ट का बढ़ावा करना है जो समाज में जातिवाद और पक्षपात का बढ़ावा करेंगे और देश का नुकसान करेंगे या फिर पहले प्रस्तावित धाराओं पर चर्चा करना है कि कैसे वे देश के समस्याओं को कम करेगा और फिर निर्णय करना है.