इस PM ने 51 साल पहले PAK को दिया था मुंहतोड़ जवाब

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देश के दूसरे पीएम लाल बहादुर शास्त्री का जन्म रामनगर में मुंशी शारदा प्रसाद के यहां 2 अक्टूबर 1904 को हुआ था। साहित्यकार नीरजा माधव ने ‘भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री’ किताब लिखी है। ये अकेले ऐसे प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने 1965 में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के लाहौर में घुसकर पाकिस्तानियों को मुंहतोड़ जबाब दिया था।

पाकिस्‍तानियों को दिया था मुंह तोड़ जवाब
– शास्त्री जी ने अपने कार्यकाल में 1965 में पाकिस्तानियों को लाहौर में घुसकर मुहं तोड़ जबाब दिया था।
– वो कहते थे अहिंसा हमारा परम धर्म है। जब कोई बड़ी हिंसा करता है जिसमें लोगों और देश का अहित हो। बच्चे, पत्नी, माताएं बिलखती हैं, तो ऐसी जगह पर अहिंसा का राग अलापना कायरता है।
– इस प्रकार वो क्रांति और शांति दोनों के दूत थे।
– लाल बहादुर शास्त्री अकेले ऐसे प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के लाहौर में घुसकर पाकिस्तानियों को मुहतोड़ जबाब दिया था।
– सेना ने पाकिस्‍तानी लाहौर में घुसकर तिरंगा फहराया था।

पानी की बौछार से हटवाई थी भीड़
– शास्त्री जी के पड़ोसी नसीम अहमद, अभिषेक दिवेदी और नीरजा माधव ने उनके जीवन से जुड़े कई दिलचस्प किस्से फैक्ट्स को बताया।
– वे जब पुलिस मिनिस्टर थे, तब उन्होंने देश में पहली बार लाठी चार्ज की जगह पानी की बौछार डालने का आदेश जारी किया था, ताकि कोई घायल न हो।
– परिवहन मंत्री जब थे, तब उन्होंने सबसे पहले महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की थी।
– बचपन में ही पिता की मौत होने से पूरी जिम्मेदारी मां रामदुलारी पर आ गई थी।
– कुछ दिनों तक मायके रहने के बाद बेटे लालबहादुर को लेकर रामदुलारी पैतृक आवास रामनगर आ गयी थी ।अत्यंत गरीबी में कर्ज लेकर मां ने किसी तरह शास्त्री जी की पढ़ाई करवाई

बचपन में था तैराकी का शौक
– ये बचपन में काफी नटखट हुआ करते थे। इसलिए उनका नाम नन्हें रखा गया था।
– ग्रामीण बच्चों के साथ उनको गंगा में तैराकी का बहुत शौक था।
– बताया जाता है कि बचपन में उन्होंने अपने एक साथ पढ़ने वाले दोस्‍त को डूबने से भी बचाया था।
– गंगा पार आने के बाद शास्त्री जी हफ्ते में एक दिन पैदल ही काशी का भ्रमण किया करते थे।

ऐसे रहूंगा तो भी समझूंगा गरीबों का दर्द
– जब वो रेलमंत्री थे, तो काशी आगमन पर जनता में उनका संबोधन था।
– मैदागिन में जहां वो रुके थे, वहां से जब वो निकल रहे थे, तो उनके एक सहयोगी ने उनको टोका कि आपका कुर्ता साइड से फटा है।
– शास्त्री जी ने विनम्रता से जबाब दिया कि गरीब का बेटा हूं। ऐसे रहूंगा तभी गरीब का दर्द समझ सकूंगा।
– शास्त्री जी ने परमाणु हथियारों को समुद्र में पहली बार न छोड़ने की बात कही थी। उनका मानना था कि जल में रहने वाले हजारों जीव मर जाते हैं। इससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है।

PAK को दिया था मुंह तोड़ जवाब
– शास्त्री जी ने अपने कार्यकाल में पाकिस्तानियों को लाहौर में घुसकर मुहं तोड़ जबाब दिया था।
– वो कहते थे अहिंसा हमारा परम धर्म है। जब कोई बड़ी हिंसा करता है जिसमें लोगों और देश का अहित हो। बच्चे, पत्नी, मांए बिलखती हैं, तो ऐसी जगह पर अहिंसा का राग अलापना कायरता है।
– इस प्रकार वो क्रांति और शान्ति दोनों के अग्रदूत थे।
– लाल बहादुर शास्त्री अकेले ऐसे प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के लाहौर में घुसकर पाकिस्तानियों को मुहतोड़ जबाब दिया था।

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पत्‍नी ने डाल दिया था चिता में लेटर
– शास्त्री जी समझौते के लिए जब तास्कंद गए थे, तो उस समय उनकी पत्नी ललित शास्त्री जी ने अपने मन की बातों को एक पत्र में लिख कर रखी थीं।
– ताकि जब वो आएंगे तब उनको अपने मनोभाव पढ़ने के लिए देंगी।
– तास्कंद से 12 जनवरी 1966 को उनका पार्थिव शरीर भारत आया, इसी दिन विजयघाट पर उनकी जलती चिता में उन्होंने वह लेटर इस सोच के साथ डाल दिया- ‘अब अपने मन की बात वहीं आकर करूंगीं।’

एक दिन का व्रत रखें देशवासी
– शास्त्री जी ने युद्ध के दौरान देशवासियों से अपील की था कि अन्न संकट के लिए सभी देशवासी सप्ताह में एक दिन का व्रत रखें।
– उनके कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार व्यक्तित्व की इस पुकार से समस्त देशवासी एकजुट हुए और सभी ने सोमवार को व्रत रखना प्रारम्भ कर दिया था।
– इससे देश में खाद्यान संकट समाप्त हुआ था।

शास्त्रों में है लोकतंत्र के चारों स्तंभ को मजबूत करने की शक्ति
– शास्त्री जी शिक्षा के बारे में भी बहुत सोचते थे उनका मानना था कि प्रारंभिक शिक्षा में हिंदी भाषा अनिवार्य है।
– उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में दर्शनशास्त्र अवश्‍य पढ़ाया जाए। इससे ऋषि मुनियों आदि का ज्ञान मिल सकेगा।
– उनको विश्‍वास था कि हमारे शास्त्रों में लोकतंत्र के चारों स्तंभ को मजबूत करने की शक्ति है। इसीलिए वो सभी तक भारतीय दर्शन पहुचांना चाहते थे।
– उनका मानना था कि गांव समृद्ध होगा, किसान समृद्ध होगा तो देश समृद्ध होगा।
– देश की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए हमें अपने सैन्य बल को समृद्ध करना होगा। इसलिए उन्होंने जय जवान-जय किसान का नारा दिया।फटे कुर्ते पहनते थे शास्‍त्री
– शास्त्री जी फटे कपड़ों का रुमाल बनवाते थे। थोड़े फटे कुर्तों को कोट के नीचे पहनते थे।
– पत्नी के टोकने पर कहा था कि देश में बहुत ऐसे लोग हैं, जो ऐसे ही गुजारा करते हैं।
– शास्त्री जी किसी भी कार्यक्रम में वीवीआइपी की तरह नहीं बल्कि आम आदमी की तरह रहना पसंद करते थे।
– दोपहर के खाने में अक्सर वो साग रोटी खाया करते थे। कार्यक्रम आयोजक अक्सर तरह-तरह के पकवान उनके लिए बनवाते थे।
– शास्त्री जी आयोजकों को डांटते थे और समझाते थे। गरीब आदमी भूखा सोया होगा और मै मंत्री बन पकवान खांऊ ये शोभा नहीं देता। शास्त्री जी को पैदल चलना बहुत पसंद था।

इन्‍होंने ही लगवाया था पंखा
– शास्त्री जी एक बार रेल में सफर कर रहे थे, तब उनकी बोगी में एसी चल रहा था। पीए से पूछा और काफी नाराज हुए।
– उन्होंने कहा एसी बंद करो तभी जनता के रेल सफर का दर्द समझ में आएगा। उन्होंने ही जनरल बोगियों में पहली बार पंखा लगवाया था।

गंगा में तैरकर जाते थे स्‍कूल
– काशी के राम नगर स्थित अपने पैतृक आवास से जब शास्त्री जी बचपन में पढ़ाई के लिए निकलते थे, तो रोज गंगा नदी तैरकर पार किया करते थे।
– माथे पर बस्ता और कपड़ा रख कर शास्त्री जी कई किलोमीटर लंबी गंगा को आसानी से पार किया करते थे।
– शास्त्री जी अक्सर हरिश्चन्द्र इंटर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान देर से पहुंचा करते थे। क्लास के बाहर खड़े होकर पूरा नोट्स बना लेते थे।

थप्‍पड़ के जवाब में लगा लिया गले
– हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान उन्होंने साइंस प्रैक्टिल में यूज होने वाले बिकर को तोड़ दिया था।
– स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्‍हें जोरदार थप्पड़ मारा, लैब से बाहर निकाल दिया था।
– रेलमंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जी जब मंच पर थे, तो देवीलाल उनको देखते ही हट गए।
– लेकिन शास्त्री जी ने उनहे पहचान लिया, देवीलाल को पहचान गए और मंच पर बुलाकर गले लग गए।

कैसे बने शास्‍त्री
– जब वह प्रधानमंत्री बनकर पहली बार घर आ रहे थे, तब पुलिस चार महीने पहले से रिहर्सल कर रही थी।
– इसमें गलिया बाधक बन रही थीं। इन्हें तोड़ने का फैसला किया गया।
– यह बात शास्त्री जी को मालूम पड़ी तो उन्होंने तत्काल खबर भेजी कि गली को चौड़ा करने के लिए किसी भी मकान को तोड़ा न जाए। मैं पैदल घर जाऊंगा।
– काशी विद्यापीठ में बीए की डिग्री को शास्त्री कहते थे। इसी डिग्री को उन्होंने अपना टाइटिल बना लिया जो आज भी उनके परिवार की पहचान है।

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