Rajiv Dixit – अगर भोजन को बनाते समय ये 2 चीजे ना मिले तो वो धीमा जहर है

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बाग़भट्ट जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन की 85% चिकित्सा स्वंय कर सकता है 15% रोगों में विशेषज्ञ की जरुरत पड़ती है. उसके लिए उन्होंने स्वस्थ रहने के 15 सूत्र बताये है जिनमे से हम एक महत्वपूर्ण सूत्र आज आपको बताने जा रहे है जिसे अपने जीवन में उतारने से हम काफी हद तक बिमारियों से अपने आपको बचा सकते है.

बागभट्ट जी कहते है कि जिस भोजन को पकाते समय पवन का स्पर्श और सूर्य का प्रकाश न मिले वो भोजन कभी मत करना क्यूंकि यह भोजन नही विष है. दुनिया में दो तरह के विष हैं एक जो तत्काल असर करे और दूसरा जो धीरे धीरे( 2 साल से 20 साल) असर करे और आपको धीरे धीरे मरने की स्तिथि में पहुंचा दे और यह भोजन जिसमें सूर्य का प्रकाश न हो या पवन का स्पर्श न हो बह भोजन दूसरी तरह का ही जहर है जो धीरे धीरे असर करता है

अब तक हम बागभट्ट जी के शब्दों में बात कर रहे थे अगर हम राजीव जी द्वारा कहे गए या आज की भाषा में बात करें तो प्रेशर कुकर का इस्तेमाल न करें क्योंकि उसमे भोजन बनाते समय न तो सूर्य का प्रकाश उसको मिलेगा और न ही पवन का स्पर्श, प्रेशर कुकर में अंदर की हवा तो बाहर आ सकती है. लेकिन बाहर की हवा अंदर जाने की कोई व्यवस्था उसमें नही है. यह सूत्र बाग़भट्ट जी ने 3500 साल पहले लिखा था शायद उनको पता था कि मनुष्य कभी न कभी यह डीवाईस बना ही लेगा इस सूत्र का सिद्धांत प्रेशर कुकर के साथ लागू होता है.

राजीव जी ने यह परीक्षण वैज्ञानिको द्वारा करवाया कि बाग़भट्ट जी का सूत्र सही है या नही तो वैज्ञानिको ने यह पाया कि उनकी बात 100% सही है. उनका कहना है कि प्रेशर कुकर एल्युमीनियम के बने होते हैं और भोजन रखने के लिए और बनाने के लिए सबसे खराब मेटल यही है.

उन दोनों वैज्ञानिको ने कहा कि यदि 17 या 18 साल तक प्रेशर कुकर में बना खाना लगातार खा लिया जाए तो डाईबीटीस, आर्थराइटिस तो हो ही जायेगा और सबसे ज्यादा टी बी और अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाएगी. उन वैज्ञानिको ने कहा कि हम अब तक 48 बीमारियों को डिटेक्ट कर चुके हैं, जो प्रेशर कुकर से होती है और अधिक होने की संभावना है और इन रिसर्चरो ने सबसे ज्यादा रिसर्च जेलों में किया क्योंकि वहां सभी कैदियों को एल्युमीनियम के बर्तन में ही खाना मिलता है, उन्होंने बताया कि इस खाने से प्रतिकारक शक्ति बहुत कम होती है और रोग बहुत जल्दी आते है

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किस बर्तन में पकाए भोजन

बाग़भट्ट जी कहते हैं कि मिटटी की हांड़ी में बनी हुए सब्जी खाए क्योंकि उसमें सारे न्यूट्रीयंट्स होते है. एक बार राजीव जी मिटटी की हांड़ी में बनी दाल को पूरी से लेकर भुवनेश्वर गए भुवनेश्वर में CSIR का लेबोरेटरी रिसर्च सेंटर है. तो वैज्ञानिको से उन्होंने उस दाल का विसलेषण करने के लिए कहा, तो उन्होंने कहा कि उनके पास उपकरण नही हैं. आप इसे दिल्ली ले जाइये. राजीव भाई ने कहा कि दिल्ली तक जाने में तो ये ख़राब हो जाएगी. तब वह के वैज्ञानिकों ने कहा कि ये दाल ख़राब नही होगी क्यूंकि ये हांड़ी में बनी है. उसे ले जाने में 2 दिन लगे क्यूंकि भुवनेश्वर से दिल्ली का रास्ता 2 दिन का है. राजीव भाई फिर उसे दिल्ली लेकर आये और उस पर वैज्ञानिकों द्वारा रिसर्च किया गया.

कितने न्यूट्रीयंट्स रह जाते है कुकर से बने भोजन में

वैज्ञानिकों ने बताया कि इस दाल में मौजूद एक भी माइक्रो न्यूट्रीयंट्स पकाने के बाद भी कम नही हुए. फिर राजीव जी ने उन वैज्ञानिको को कुकर की बनी हुई दाल पर परिक्षण के लिए कहा तो उन्होंने रिसर्च के बाद कहा कि इसमें बहुत ही कम न्यूट्रीयंट्स हैं तो राजीव जी ने पूछा की कितने पर्सेंट न्यूट्रीयंट्स हैं तो वैज्ञानिको ने बताया की यदि अरहर की दाल को मिटटी की हांडी में पकाओ और उसमे 100% न्यूट्रीयंट्स हैं तो वही दाल अगर प्रेशर कुकर में बनी हो तो उसमें 13% ही न्यूट्रीयंट्स रह जायेंगे 87% खत्म हो जायेंगे.

क्या कारण है कि कुकर में सब्जी नही पकती

इसका कारण यह है कि ये जो प्रेशर पड़ा है ऊपर से इसने दाल के कणों को तोड दिया है. कण टूट गये हैं, और दाल बिखर गई हैं ,पकी नही है, सॉफ्ट हो गयी है. खाने में हमें यह लग रहा है कि यह पक्का हुआ खा रहे है लेकिन वास्तव में वो पका हुआ नही है. आयुर्वेद में पका हुआ खाने का मतलब है जो हम कच्चा नही खा सकते, उसे पका हुआ बना लें इसलिए उन्होंने कहा की यह मिटटी की हांड़ी में बननी हुई दाल बहुत उपयोगी है.

मिटटी के बर्तनों में बने खाने के फायदे

यही कारण है कि हमारे बजुर्ग जो मिटटी के बर्तनों में भोजन बनाया करते थे उन्हे कभी डाईबीटीस नही होता था, कभी अर्थराइटिस नही होता था, 100 साल से ज्यादा जीते थे और मरते समय तक 32 के 32 दांत सुरक्षित होते थे. आँखों पे चश्मा नही होता था

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