भोजन करते समय इस नियम का पालन करे ताकि खाना सही से पचे

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वागभट्ट जी कहते हैं की सबसे बड़ा दुःख होता है दैहिक दुःख यानि शरीर का दुःख और दूसरा है वैदिक दुःख यानि भगवन द्वारा दिया गया दुःख और तीसरा है भौतिक दुःख, भोतिक दुःख हमारे देश के लोगों के लिए जानना इतना जरुरी नही है हमें सिर्फ दैहिक दुखों के बारे में ज्ञान होना ही अनिवार्य है

शरीर के दुःख दूर कैसे करें – वागभट्ट जी कहते हैं यदि आपको शरीर के दुःख दूर करने हैं तो आपका पेट स्वस्थ होना चाहिए ये जो शरीर का मध्य भाग यानि पेट है यंही से अन्य रोग उत्पन्न होते है यदि पेट की शरीर के अन्य भागों के साथ तुलना करें तो 90% रोग पेट के हैं 10% रोग ही पेट के बाहर से होते हैं यानि घुटनों से एडी से जांघ हृदय या मष्तिष्क आदि से हो सकता है

वागभट्ट जी कहते हैं कि पेट आपके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है तो इसका बहुत ध्यान रखें जो आपको दुखों से बचाता है तो पेट का अगर ध्यान रखना है तो उन्होंने इसके लिए कुछ सूत्र लिखें जिनको हम अपने जीवन में पालन करें तो जीवन भर कोई दुःख नही होगा यदि हम पेट से जुडी बिमारियों को गिने तो इनकी संख्या 148 है. यदि हम इन सूत्रों का पालन करेंगे तो 148 बिमारियों से बचेंगे और वागभट्ट जी का ये कहना है की बिमारियों से बचना बहुत महत्त्व का है बजाय इसके की उनका इलाज करना इसीलिए अंग्रेजी में कहा गया है “prevention is better than cure”

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वैसे तो वागभट्ट जी के 7000 सूत्र बहुत महत्वपूर्ण के है वो सूत्र उस समय ऋषि मुनियों के काल में उनके लिए सभी महत्वपूर्ण थे तो इन्ही सूत्रों में से कुछ एक सूत्र आज के समय के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं उनमे से एक ये है की आप जो कुछ भी खाते हैं उसका पचना, उनका कहना है कि खाना(भोजन) महत्त्व का नही है उसको पचाना महत्त्व का है आपने जो भोजन खाया उसका इतना महत्त्व नही है. जितना उसको पचाने का महत्त्व है. क्योंकि खाना पचेगा तो उसका रश बनेगा उसी रस में से मांस मज्जा अस्थि आदि बनेगी जोकि आगे जीवन में काम आयेंगी.

वो कहते हैं की पेट हमेशा दरुस्त रहे माने पाचन किर्या आपकी हमेशा अच्छे से चलती रहे उसके लिए उन्होंने कुछ सूत्र बताये है जिसमे से एक यह है कि “भोजनान्ते विषम वारि” इसका मतलब है भोजन के बाद पानी पीना विष पीने के बराबर है वागभट्ट जी कहते हैं की हमारे पेट में नाभि के पास एक स्थान है जिसे हम जठर(अमाशय) कहते हैं वागभट्ट जी कहते हैं की इस स्थान पर अग्नि प्रदीप्त होती है जिसको कहते हैं जठराग्नि और भोजन सबसे पहले अमाशय में ही जाता है वह अग्नि भोजन का पाचन करती है

यह अग्नि खाते ही प्रदीप्त होती है तो यह अग्नि भोजन को पेस्ट के रूप में बदल देती है पहले रस बनेगा फिर पेस्ट का रस बनेगा यदि भोजन खाते ही हम्म पानी पी लें तो अग्नि शांत हो जाएगी फिर वह भोजन पचेगा नही बल्कि सड़ेगा भोजन अगर सड़ेगा तो सबसे पहले गैस बनेगी वायु की तीर्वता जब बढेगी तो गले में जलन होगी छाती में जलन होगी पेट में जलन होगी तो यह वायु सरे शरीर में घूमेगी, शारीर में घूमेगी तो मष्तिष्क में जाएगी चक्कर आयेंगे सिरदर्द होगा पीठ में भी दर्द हो सकता है आपको लगेगा की हार्ट अटैक हो गया है लेकिन वो गैस का दर्द है ज्यादा दिन ऐसे ही चलता रहा तो अल्सर, बवासीर यानी इस वजह से एसिडिटी से लेकर कैंसर तक के रोग हो सकते हैं

जब भोजन सड़ेगा तो कोलेस्ट्रोल बनेगा अगर भोजन पचेगा तो शून्य कोलेस्ट्रोल बनेगा वागभट्ट जी कहते हैं कि ये ज ख़राब कोलेस्ट्रोल है ये रक्त में तभी आता है जब भोजन सड़ता है यानि जिनको कोलेस्ट्रोल की शिकायण है वो ध्यान दे की उनको भोजन पाच नही रहा सड़ रहा है

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