टाटा ने फोर्ड की सबसे चर्चित ब्रांड जगुआर ख़रीद कर लिया था, अपने एक अपमान का बदला

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कहते हैं, अपमान की लौ प्रायः प्रतिशोध की ज्वाला में तब्दील हो जाती है। किन्तु महान व्यक्ति अपने इसी अपमान रूपी क़लम से अपनी सफ़लता की कहानी लिखते हैं। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प कहानी है भारत के जाने-माने उद्द्योगपति रतन टाटा के अपमान की।

ग़ौरतलब है कि रतन टाटा की अगुवाई वाली टाटा समूह ने साल 1988 में भारत की आटोमोबाइल जगत में घुसने का फ़ैसला लिया था। बाज़ार में टाटा ने अपनी पहली हैचबैक कार इंडिका को पेश किया। लेकिन लोगों ने इसे पूरी तरह नकार दिया। अगले एक साल तक बिक्री नहीं के बराबर होने से कंपनी को भारी नुक़सान झेलना पड़ा। अंत में रतन टाटा नें अपनी कार डीवीजन को बेचने का फ़ैसला लिया। उन्होंने दुनिया की सभी बड़ी कंपनियों को प्रस्ताव भेजा। अमेरिकी कंपनी फोर्ड ने दिलचस्पी दिखाते हुए रतन टाटा को फोर्ड हेडक्वार्टर डेट्रॉयट बुलाया।

जब रतन टाटा कंपनी के कुछ उच्च अधिकारीयों के साथ फोर्ड हेडक्वार्टर पहुँचे तो इनके प्रति फोर्ड का रवैया बेहद ही अपमानजनक था। लंबी बातचीत के बाद बिल फोर्ड नें रतन टाटा को नसीहत देते हुए कहा ‘जब आपको पैसेंजर कार के बारे में कुछ पता ही नहीं था तो बिजनेस शुरू क्यों कर दिया। हम इसे खरीदकर आप पर एहसान ही करेंगे। तत्पश्चात टाटा ने करार न करने का फैसला करते हुए स्वदेश लौट आये। वापसी यात्रा के दौरान रतन टाटा बेहद ही भावुक और उदास थे। किन्तु कुछ दिनों बाद लोगों ने टाटा की कार में रूचि दिखानी शुरू कर दी। और धीरे-धीरे टाटा दुनिया की शीर्ष आटोमोबाइल कंपनी में शुमार करने लगी।

इस घटना के क़रीब नौ वर्ष बाद 2008 में फोर्ड दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गयी। फोर्ड की बहुचर्चित ब्रांड जगुआर-लैंडरोवर को भारी नुकसान का सामना करना पर रहा था। तब टाटा ने फोर्ड के इस लग्जरी ब्रांड को खरीदने का फैसला किया। बिल फोर्ड ने मुम्बई आकर 2.3 अरब डॉलर (उस समय 9300 करोड़ रुपए) में सौदा तय किया। फोर्ड ने टाटा की सराहना करते हुए कहा ‘जेएलआर खरीदकर आप हम पर बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं।’

है ना काफ़ी दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी ?