अमेरिका में करोड़ों का कारोबार छोड़, खेती सिखा रहा है इंजीनियर

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आज की युवा पीढ़ी पढ़ाई लिखाई के बाद नौकरी करने के लिए विदेश जाना पसंद करती है, लेकिन वो अपने पीछे छोड़ जाते हैं अपनी मिट्टी की खुशबू, यहां की आबो हवा, माता पिता और रिश्तेदार। लेकिन उन्हीं लोगों में से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो विदेश में तरक्की का स्वाद चखकर अचानक एक दिन सब छोड़ कर अपने वतन वापस लौट आते हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि वो अपने वतन के लिये, अपने लोगों के विकास के लिए कुछ करना चाहते हैं, वो उनकी तरक्की में भागीदार बनना चाहते हैं।

ऐसे ही एक शख्स हैं राजस्थान के श्रीगंगानगर (Sri Ganganagar, Rajasthan) के रणदीप सिंह कंग (Randeep Singh Kang)। जो अमेरिका (USA) में अपना करोड़ों का कारोबार छोड़ भारत लौट आये और आज किसानों को उनकी फसल से बीमारियों से बचाने का एक रामबाण इलाज मुहैया करा रहे हैं। वो गौमूत्र की मदद से एक खास तरह की जैविक खाद बना रहे हैं। जिससे ना सिर्फ फसल की पैदावार बढ़ती है बल्कि पानी की भी कम खपत होती है।

रणदीप सिंह कंग पेशे से इंजीनियर हैं। उन्होने मुंबई के श्यामलाल कॉलेज से इलेक्ट्रोनिक्स में बीटेक किया है। इसके बाद साल 2002 में रणदीप की शादी हो गयी और वो अपनी मास्टर्स की पढ़ाई के लिए कैलिफोर्निया (California, USA) चले गये। यहां उन्होने सैन जॉस विश्वविद्यालय से इलेक्टॉनिक्स में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। रणदीप को बचपन से ही हॉकी को लेकर काफी लगाव था यही वजह है कि वो राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी भी रह चुके हैं। बावजूद इसके उनके पिता नहीं चाहते थे कि रणदीप हॉकी में अपना करियर बनाये, बल्कि उनकी तमन्ना थी वो एक दिन इंजीनियर बने। रणदीप ने भी पिता के अरमानों को पूरा करते हुए हॉकी को अलविदा कह दिया और वो बीटेक की पढ़ाई में जुट गये। इस दौरान वो कई बार अपने पिता के साथ खेतों में जाया करते थे। रणदीप ने इंडिया मंत्रा को बताया कि

मैं अपने माता पिता का इकलौता बेटा था मेरी तीन बहने थीं। इसलिए पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए ही मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और इसी में अपना करियर बनाया।

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बीटेक की पढ़ाई खत्म करने के कुछ समय बाद उनकी शादी हो गई, लेकिन रणदीप अभी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते थे। इसलिये उन्होने कैलिफोर्निया के सैन जॉस विश्वविद्यालय (San Jose State University in San Jose, California, United States) में दाखिला ले लिया। यहां से उन्होने इलेक्टॉनिक्स में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद वो वहां पर नौकरी करने लगे। करीब 5 साल नौकरी करने के बाद साल 2007 में उन्होने वॉशिगटन (Washington, USA) में अपना पहला डिपार्टमेंटल स्टोर (departmental store) खोला। धीरे धीरे उनकी आमदनी बढ़ती गई और उन्होने वांशिगटन में ही दो और स्टोर खोल लिये। रणदीप बताते हैं कि

इतने सालों तक मैं सिर्फ पैसा ही कमाता रहा इस कारण मैं अपने खेती करने के शौक को पूरा नहीं कर पा रहा था। लेकिन कुछ वक्त बाद मेरे पास इतना पैसा हो गया था कि मैं अपना शौक पूरा कर सकता था।

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अमेरिका में रणदीप के एक दोस्त रहते थे और उनका अपना संतरे का बाग था। एक बार उनके दोस्त ने उनके पास आकर कहा कि उनके संतरे के बागों में फसल ठीक नहीं हो रही है वो उसे सुधारने के लिए कोई उपाय बतायें। तब रणदीप ने उन्हें प्रयोग के तौर पर जैविक खेती (organic farming) के बारे में बताया। इससे संतरे के बागों में उपज बढ़ने लगी। धीरे-धीरे वो इसमें और प्रयोग करते गये जिससे अच्छी जैविक खाद (organic fertilizer) तैयार हो गयी। तब रणदीप ने इस प्रयोग को भारत वापस आकर अपने गांव में भी शुरू करने के बारे में सोचा। इस बारे में उन्होने अपनी पत्नी से बात की तो उनकी पत्नी भी इस काम के लिये खुशी-खुशी तैयार हो गई। दूसरी ओर रणदीप अपने बच्चों के साथ अमेरिका में रहते थे लेकिन यहां उनके माता पिता बिल्कुल अकेले हो गये थे, क्योंकि उनकी तीनों बहनों की शादी हो गई थी। इसलिए अब उनके पिता भी चाहते थे कि उनका बेटा वापास लौट आये। इस तरह साल 2012 में रणदीप अमेरिका में अपने तीनों डिपार्टमेंटल स्टोर बेचकर भारत वापस आ गये।

राजस्थान के श्रीगंगानगर में आने के बाद उन्होने देखा कि यहां पर ज्यादातर खेती अब भी बारिश पर ही निर्भर है। फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए किसान बड़ी मात्रा में फर्टिलाइजर (fertilizer) और पेस्टीसाइड (pesticide) का इस्तेमाल कर रहें है। जिससे मिट्टी की उर्वरता कम हो रही थी वहीं दूसरी ओर जो फसल पैदा होती उसको खाने से उस इलाके के ज्यादातर लोग कैंसर, डाइबिटीज और हड्डी के रोगों से पीड़ित हो रहे थे। ये देख रणदीप का मन विचलित हो गया। वो गांव में आकर लोगों को जैविक खेती के बारे में बताने लगे, लेकिन ज्यादातर किसान उनकी बातों पर विश्वास नहीं करते। इसके बाद रणदीप ने साल 2014 में गांव में अपनी 100 बीघा जमीन पर खेती करना शुरू किया। वहां उन्होने संतरे के बाग, फसलों और सब्जियों में जैविक खाद डालना शुरू किया। इस खाद को उन्होने खुद ही तैयार किया था। खाद में उन्होने गोमूत्र के साथ नीम, आक, धतूरा, तूंबा, मिर्च और लहसुन को उबाल कर मिलाया था। रणदीप कहते हैं कि

हमारे यहां पुराने समय से ही गोमूत्र पीने के लिए कहा जाता है क्योंकि इसके काफी फायदे हैं और आज के समय में कोई गोमूत्र पी नहीं सकता है। इसलिए मैंने इसे खेती में डालने के बारे में सोचा।

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वो बताते हैं कि किसी भी खेत से भरपूर फसल लेने के लिये 14 तरह पोषण की जरूरत होती है, जबकि गोमूत्र में 16 तरह के पोषक तत्व पाये जाते हैं। यही वजह है कि गोमूत्र को खेती में डालने से इसके सब पोषक तत्व फसल में मिल जाते हैं। इस वजह से जब हम फल, सब्जी और अनाज खाते हैं तो इसके पोषक तत्व अपने आप हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं। खास बात ये है कि जैविक खेती में फसलों को पानी की भी कम जरूरत पड़ती है। रणदीप बताते हैं कि

इस जैविक खाद (organic fertilizer) के इस्तेमाल से पहले साल फसल को 5 बार पानी देना पड़ता है, वहीं दूसरे साल 4 बार और तीसरे साल 3 बार ही सिंचाई करनी पड़ती है। साथ ही इस फसल में दीमक, फंगस और कीड़े भी नहीं लगते हैं और फसल पहले की तुलना में ज्यादा होती है।

धीरे-धीरे उनकी जैविक खेती (organic farming) में किये गये तजुर्बे की चर्चा गांव के दूसरे लोगों के बीच होने लगी। कई लोग उनसे इस खाद को बनाने का तरीका पूछने लगे, लेकिन काफी लोग ऐसे थे जो इस जैविक खाद को खरीदना चाहते थे। तब रणदीप ने इसे ज्यादा मात्रा में बनाने का सोचा इसके लिए उन्होने एक गोशाला से सम्पर्क किया और उनसे 5 रूपये लीटर के हिसाब से गोमूत्र खरीदना शुरू किया है। उसमें दूसरी चीजें मिलाने के बाद अब ये किसानों को 40 रूपये लीटर के हिसाब से बेचते हैं। रणदीप पिछले 6 महीनों से किसानों के बीच जैविक खेती को लेकर बैठक कर उनके बीच जैविक खाद को लेकर जागरूकता फैला रहे हैं। वो अब तक पंजाब और राजस्थान में करीब 100 जगहों पर ऐसी बैठकें कर चुके हैं

जैविक खेती (organic farming) के फायदे के बारे में रणदीप कहते हैं कि इससे फसल का उत्पादन तो बढ़ा ही है। वहीं खेती करने की लागत में भी कमी आई है। कपास की खेती में सफेद मच्छर फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। इसे रोकने में सरकार का कृषि विभाग भी फेल हो गया है, लेकिन इस जैविक खाद के प्रयोग से कपास में सफेद मच्छर भी नहीं लगते हैं। जैविक खेती में अब रणदीप के साथ करीब 200 किसान जुड़ चुके हैं। राजस्थान के अलावा वो अपनी जैविक खाद को पंजाब. हरियाणा. मध्य प्रदेश के इंदौर और गुजरात के कोटा में भी पहुंचा चुके हैं।

अपनी परेशानियों के बारे में उनका कहना है कि शुरू में किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने के लिए वो मुफ्त में जैविक खाद बांटते थे। काफी सारी फर्टिलाइजर कम्पनियां हैं जो इनसे जैविक खाद 50 रुपये लीटर में खरीदना चाहती हैं, लेकिन रणदीप इसके लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि

पैसा तो अमेरिका में मैं बहुत कमा रहा था। मैं तो यहां किसानों की मदद और उन्हें जैविक खेती के लिए जागरूक करना चाहता हूं जिससे हमारे देश के लोगों को कैमिकल से मुक्त अनाज और फल खाने को मिलें।

खास बात ये है कि रणदीप ये काम बिना किसी सरकारी या दूसरी मदद के कर रहे हैं। वो चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा किसान इस तरह की जैविक खेती से जुड़ें ताकि उनको भरपूर फसल मिल सके।

इस विडियो में राजीव भाई से सुनिए खेती करने का सबसे बढ़िया तरीका जिसपर आपका खर्च बिलकुल जीरो हो जायेगा >>>

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