गाय के गोबर से प्राप्त राख की लैब रिपोर्ट पढ़कर चोंक जाएगे आप !

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आप को याद होगा कि जब हम छोटे होते थे और कहीं बाहर जाते थे तो मां या दादी हमें एक चुटकी हारे (जिसमे उपलों की मदद से खाना बनाया जाता है) कि राख खिला देती थी। मेरे बाल मन में तब प्रश्न उठता था तो मै मां या दादी से अक्सर पूछ लिया करता कि ये राख मुझे क्यों खिलायी जा रही है। उत्तर भी अजीब ही होता था कि “बेटा राह म्हं भूतणी ना चिपटै”। रात को सोते वक्त दादी से या बुआ से कहाणी सुणते वक्त फिर पूछ लेता था कि आंरी दादी आंए बुआ भूत हों सैं के? उत्तर मिलता था नहीं होते। वो मेरी शुभ चिंतक मां और दादी मुझे राख क्यों चटाती थी इस का वैज्ञानिक उत्तर नीचे दी गयी प्रयोगशाला 19 सितम्बर 2016 की रिपोर्ट में है। यह प्रयोगशाला विश्व स्तरीय है। यह राख तो सोना ओर चांदी लिए हुए है दोस्तो। लोहा इस में भरपूर है, साथ में अन्य मिनरल्स भी हैं।

इसी लिए गोबर कि थेपड़ियों (कंडे का छोटा रूप) से रोटी पकाई जाती थी व बर्तन मांजे जाते थे ताकि कुछ मात्रा में राख स्वतः हमारे पेट में जाती रहे। दादी जी आज आपको मान गया कि आप कितनी बड़ी वैज्ञानिक है . You were great scientist then present ones.

अब धीरे धीरे ये भी समझने कि कोशिश में लगा हुं कि आप गोबर से साल, दीवार व चुल्हा आदि क्यूं लीपते थे।
मैं गोबर से लीपे मेरे कार्यालय वैदिक भवन में हर दिन हर पल यह महसूश करता ह़ु कि सीमेंट से मिट्टी व गोबर का प्लास्टर सौ नहीं हजार गुणा बेहतर है। दीवाली आ रही है मित्रों आप भी एक या दो कमरों या अपने कार्यालय में वैदिक प्लास्टर करा कर देखें और अंतर स्वयं महसूश करें। अधिक जानकारी के लिए www.vedicplaster.com देखें।
क्या ज्ञान था हमारा क्या विज्ञान था।
डॉ. शिव दर्शन मलिक, वैदिक भवन, शीला बायपास, रोहतक (हरियाणा), 9812054982

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