गाँव में नहीं थी बिजली ! अब गाँव का बच्चा -बच्चा जनता है बिजली बनाना

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गोबर गैस प्लांट से बिजली बनाना तो सबको मालूम है. लेकिन कुल्हड़ में गोबर से बिजली पैदा करने का अनोखा प्रयोग हो रहा है, बाराबंकी जिले के एक गॉव में. यह गाँव है पूरेझाम तिवारी जो सुलतानपुर रोड पर हैदरगढ़ कस्बे से पाँच किलोमीटर की दूरी पर है. यह प्रयोग शुरू किया है एक युवा किसान ब्रजेश त्रिपाठी ने, जिनकी शैक्षिक योग्यता ‘इंटर पास, बीए इनकम्पलीट (यानी अधूरा) है.’  ग्राम पूरेझाम के खेतों से बिजली की बड़ी लाइन गुजरती है. गाँव में बिजली देने के लिए कुछ साल पहले खंभे भी गड़ गए थे. लेकिन न तार खिंचे, न बिजली आई.  राशन की दूकान से मिट्टी तेल महीने में प्रति परिवार केवल दो लीटर मिलता है. इसीलिए रोशनी का इंतज़ाम एक मुश्किल काम है.

इस विडियो में देखिए कैसे इस बेटी ने गाय के गोबर से बिजली बनाई >>

ब्रजेश त्रिपाठी का कहना है, “करीब दो महीने पहले मैंने पेपर में पढ़ा था कि ऐसा हो सकता है. उसको प्रैक्टिकल करके देखा तो लाइट जल गई, जल गई तो फिर बाजा भी लगाकर देखा गया कि जब लाइट जली तो बाजा भी चलना चाहिए.”  वे कहते हैं, “संयोग से एक दिन हमने कहा देखते हैं, मोबाइल भी चार्ज हो जाएगा या नहीं, तो धीरे-धीरे आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं.”

इस तरह बिजली बनाने के लिए वह झालर वाले सस्ते चीनी बल्व और बेकार हुए तीन बैट्री सेल लेते हैं. बैट्री सेल का कवर उतार कर उसमें पाजिटिव निगेटिव तार जोड़ देते हैं और फिर इन्हें अलग-अलग तीन कुल्हड़ में भरे गोबर के घोल में डाल देते हैं. इस घोल में थोड़ा सा नमक, कपड़ा धोने का साबुन या पाउडर मिला देते हैं.

इस तरह घर बैठे रोशनी पैदा करने का प्रयोग सफल देख पूरेझाम में घर-घर लोग बिजली बनाने लगे. आसपास के सैकड़ों गाँवों में भी लोग इस तरह लाइट जला रहे हैं. इसी गाँव के सदाशिव त्रिपाठी का कहना है, “जो बैट्री सेल हम बेकार समझकर फेंक देते थे. उन्हीं को अब गोबर के साथ इस्तेमाल करके बिजली बना रहे हैं.”

बिजली बनाने का यह फार्मूला गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को भी समझ में आ गया है. बच्चों का कहना है कि इस लाइट से पढ़ाई में बहुत मदद मिलती है. इसकी रोशनी लालटेन जैसी है. इस तरह सस्ती और आसान बिजली मिलने से गाँव वाले प्रसन्न और आश्चर्यचकित हैं, हालांकि उनको यह नहीं मालूम कि कुल्हड़ भर गोबर और पुराने बैट्री सेल में ऐसी कौन सी रासायनिक क्रिया होती है, जिससे बिजली बनती है. गाँव वालों को उम्मीद है कि जब तकनीकी जानकार लोग इस प्रयोग में हाथ लगाएंगे तो एक बेहतर टेक्नॉलॉजी बनकर तैयार होगी.