वात, पित और कफ को आसान भाषा में समझिए. इस जानकारी के बाद आप आधे डॉक्टर हो जाएंगे

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अब ये तो स्पष्ट हो गया है कि भोजन के बाद आपको पानी नहीं पानी है उसके स्थान पर आप जूस, ताक (छांछ या लस्सी) या दूध पी सकते है. अब आपके मन में प्रश्न होगा कि क्या ये तीनो चीजे भोजन के साथ कभी भी पी सकते है, तो हमारा जवाब नहीं है. जूस, ताक (छांछ या लस्सी) और दूध का समय भी निर्धारित है, ये आप हर समय नहीं पी सकते. कभी भी ताक (छांछ या लस्सी) नही पी सकते, कभी भी जूस नही पी सकते और कभी भी दूध नही पी सकते. तीनो का समय निश्चित है.

समय की निश्चिता यह है कि सवेरे का नास्ता अगर किया है तो नाश्ते के बाद आप जूस पी सकते है दोपहर के भोजन के बाद आप ताक (छांछ या लस्सी) पी सकते है और रात के भोजन के बाद आप दूध पी सकते है. ये जो समय का चक्कर है, इसी को ध्यान में रखना है. इसको आगे पीछे नही करना है. थोडा और समझाता हु, सुबह कभी भी दूध नही पीना, रात को कभी भी ताक (छांछ या लस्सी) नही पीना और दोपहर को कभी भी जूस नही पीना.

इस नियम पर भाई राजीव दीक्षित जी ने बहुत ऑब्जरवेशन (observation) किये थे. उन्होंने कई मरीजो कहा कि ये आगे पीछे कर दो, सुबह जो नियम है जूस पीने का वो शाम को करवाया. और कुछ मरीजो का दूध पीने का नियम सुबह करवा दिया. उसका परिणाम ये हुआ कि जो उनकी बीमारी थी उसमे कोई कमी आई. बीमारी जैसी पहले थी वैसी ही रही. लेकिन जैसे ही इस नियम को ठीक किया, सुबह को जूस पीना, रात को दूध पीना, दोपहर को ताक (छांछ या लस्सी) पीना, उनकी बीमारी कुछ दिनों में ही जड से चली गयी और वो सब इस नियम का पालन करके आज तक स्वस्थ है, दरुस्त है, तंदरुस्त है. तो आप भी इसका ध्यान रखना सुबह के नाश्ता के बाद जूस पी सकते है, संतरे का, मौसमी का, आम का, तरबूज का, खरबूज का, टमाटर का, गाजर का या पालक का. दोपहर के भोजन के बाद ताक (छांछ या लस्सी) और रात्रि के भोजन के बाद दूध.

दूध, ताक(छांछ या लस्सी) और जूस इनका तीनो का समय क्यूँ निश्चित है | हमारे शरीर में तीन दोषों का हमेशा प्रभाव रहता है |जिसको हम वात, पित और कफ कहते है. शायद आपके मन मे सवाल आए ये वात -पित्त कफ दिखने मे कैसे होते हैं ??? तो फिलहाल आप इतना जान लीजिये ! कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं ! आम भाषा मे नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं ! कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है ! मुंह मे से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं ! ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है !! और शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं !! ये अदृश्य होती है !

कई बार पेट मे गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे आप कफ का रोग नहीं कहेंगे इसे पित्त का रोग कहेंगे !! क्यूंकि पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है ! ये ज्ञान बहुत गहरा है खैर आप इतना याद रखें कि इस वात -पित्त और कफ के संतुलन के बिगड़ने से ही सभी रोग आते हैं. और ये तीनों ही मनुष्य की आयु के साथ अलग अलग ढंग से बढ़ते हैं ! बच्चे के पैदा होने से 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते है ! बार बार खांसी, सर्दी, छींके आना आदि होगा ! 14 वर्ष से 60 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं बार बार पेट दर्द करना, गैस बनना, खट्टी खट्टी डकारे आना आदि !! और उसके बाद बुढ़ापे मे वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं घुटने दुखना, जोड़ो का दर्द आदि. (ज्यादा जानकारी के लिए नीचे विडियो दिया गया है)

  1. वात का प्रभाव सुबह सबसे ज्यादा रहता है 
  2. पित का प्रभाव दोपहर को होता है
  3. कफ का प्रभाव रात को होता है

सबसे ज्यादा सुबह शरीर में वात होता है जिसमे वायु होती है और सुबह के समय वायु शरीर के लिए काफी आवश्यक है | शरीर में अगर वायु का प्रकोप न हो तो संडास नही होगी और सुबह जिनको संडास नही हुई उनकी जिंदगी तो बहुत तकलीफ में होती है | अगर सुबह वायु का प्रकोप न हो तो मल और मूत्र दोनों शरीर से बहार नहीं निकलेंगे और उसके वेग से ही ये बाहर निकलते है और अगर ये बाहर नहीं निकले तो शरीर में जहर ही जहर हो जायगा इसलिए प्रकृति ने बहुत सुंदर व्यवस्था की है कि सुबह शरीर में वायु के प्रकोप को संतुलित रखने वाली चीज पीना सुबह सबसे अच्छा है |

इसकी वैज्ञानिक पुष्टि भी हो चुकी है 

मान लीजिये आज गाव में बहुत तेज अंधी चलती है और अचानक से बारिश हो जाये तो शांति आ जाएगी | तूफान को शांत करने की ताकत पानी में है तो चूँकि शरीर को वायु का प्रकोप बहुत है तो उस समय आप जूस पी सकते हैं | जूस में सबसे ज्यादा पानी होता है उससे वायु शांत रहेगी इसलिए सुबह का समय जूस पीने का होता है |

दोपहर का समय पित की प्रकृति होती है क्यूंकी उस वक़्त सूर्य बहुत तेज होता है | दोपहर को सूर्य का पित के साथ सीधा संबध होता है | सूर्य का अग्नि के साथ सीधा संबध है और सूर्य जितना तीव्र होगा पेट की अग्नि भी उतनी तीव्र होगी और अग्नि जितनी तीव्र होगी, पित उतना ही तीव्र होगा तो इसलिए दोपहर को पित को शांत रखे ऐसी कोई चीज पीना शरीर के लिए बहुत आवश्यक है | दो वस्तुओं में पित को शांत करने की ताकत सबसे ज्यादा होती है. एक गाय का घी और दूसरा दही की ताक (लस्सी या छांछ). 

इसपर राजीव भाई का ये विडियो देखिए >>

इसलिए आयुर्वेद ने कहा गया है कि दोपहर के भोजन के बाद आप ताक (लस्सी) पिए सकते हैं | रात के समय शरीर में बहुत कफ होता है तो कफ को नियंत्रित करने की ताकत गाय के दूध में है, भैस के दूध में नहीं है, भैस का दूध कफ को बढाता है.  गाय का दूध कफ को शांत करता है | इसलिए रात के समय हमेशा दूध और सुबह के समय जूस और दोपहर के समय ताक (लस्सी या छांछ) पीना चाहिए.

इस विडियो में देखिए खाने के बाद पानी पीना कैसे वात पित के पुरे खेल को बिगड़ देता है >>