इन लोगों को नहीं रखना चाहिए उपवास, जानिए वैज्ञानिक कारण

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वागभट्ट जी ने लिखा है कि जो शाकाहारी खाने वाले लोग हैं उनके लिए ज्यादा लम्बा उपवास अच्छा नही है. लेकिन जो मांसाहारी भोजन खाते हैं उनकर लिए ज्यादा लम्बे उपवास करने ही चाहिए.

फिर उनकी इस बात को ओब्सेर्व किया गया और पाया की प्रकृति में दो तरह के जानवर हैं. कुछ हैं जो मांस ही खायेंगे, हिंसा करके ही अपना पेट भरेंगे. और कुछ शाकाहारी है. जैसे बैल हैं, बकरी हैं, चिड़िया है ये सब शाकाहारी जीव हैं. लेकिन शहर, चिता, लक्कड़बग्गा है, लोमड़ी, कुत्ता है ये सब मांस भी खाते हैं. और कुछ तो ऐसे ही जीव हैं सिर्फ मांस ही खाते हैं. जैसे सांप, अजगर ये मेंढक को खायेंगे, छिपकली को खायेंगे केंचुओं को खायेंगे.

लेकिन ये नियम के बड़े पक्के हैं. वागभट्ट ने जो कुछ सिखाया है वो सब इन्होने ही सिखा है. जैसे अजगर को ही देख लो अगर उसने एक बार खा लिया, वो कुच्छ भी खा सकता हैं बड़े से बड़े बकरे को भी, अगर खा लिया तो 15 दिन उपवास ही करेगा. 16वें दिन ही दोबारा खायेगा. तो वागभट्ट जी कह रहे हैं की यदि आप मांस ही खा रहे हैं. तो आप लम्बे उपवास जरुर करें.

क्या कारण है कि मांसाहारी लम्बे उपवास रखें >>

इसका कारण ये हैं, ये जो शरीर के अन्दर हाइड्रोक्लोरिक एसिड पैदा करने वाली ग्रंथियां है. इनको मंद करता हैं. मांस का जो पाचन हैं और उसमें से जो कुछ भी आपको मिलने वाला है वो आपके शरीर में एसिड जो पैदा करने की किर्या है उनको मंद कर देगा. तो एसिड कम निकलेगा इसलिए वो लम्बे उपवास कर सकते हैं.

शाकाहारी लोगों के लिए वो बोलते हैं कि लम्बे उपवास न करें और अगर कर भी रहे हैं. तो बीच बीच में पानी पीते रहें. और पानी कैसा पीयें, जैसे लोंग का पानी पीयें, मुंग की दाल का पानी पीयें. पानी में घी डाल कर पीयें.

दूध में घी डालकर पीयें ये तो चरक ने भी कहा है, शुश्रुक ने भी कहा है, पराशर ने कहा है, निघंटु ने कहा हैं, बहुत से लोगों ने कहा है. और पानी में घी डालकर पीयें ये वागभट्ट ज ने कहा हैं. ध्यान रहे यहाँ उन्होंने गाय के घी की बात की है. भैंस के दूध की कोई बात नही की.

पक्का पीने पीयें, मतलब उबाल के पानी बनाया हुआ. चुनने का पानी पीयें क्योंकि चूना क्षारीय होता है और शरीर में अधिक अम्ल उत्पन्न होता है. अगर लम्बे उपवास रखने ही हैं तो आप एक दिन उपवास अगले दिन खाना फिर अगले दिन उपवास फिर अगले दिन खाना खा सकते हैं. वो कहते हैं कि थोड़े दिनों में शरीर इसका आदि हो जाता है, और फिर एसिड निकलने की किर्या इसी हिसाब से हो जाएगी. इस प्रकार के व्रत को वर्सित्प कहते है.

जैन धर्म में वर्सित्प करने वालों का बहुत सम्मान किया जाता है. वो इसलिए क्योंकि वो वैज्ञानिक काम कुछ इस तरह का कर रहे है. तो वो भूख के बारे में कह रहे हैं कि भूख को ज्यादा रोकना नही. अगर आप शारीरिक मेहनत कर रहें हैं तब तो भूख बिलकुल भी नही रोकना. उनको जब भी भूख लगे तभी भोजन करें कभी भी उपवास न करें.

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